श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.85.23

दशम स्कन्ध · अध्याय 85 · अथ पञ्चाशीतितमोऽध्यायः

अहं यू१यमसावार्य इमे च द्वारकौकसः।

सर्वेऽप्येवं यदुश्रेष्ठ विमृश्याः सचराचरम्॥ २३

ahaṃ yūyamasāvārya ime ca dvārakaukasaḥ|

sarve'pyevaṃ yaduśreṣṭha vimṛśyāḥ sacarācaram|| 23

अर्थ

पिताजी! आपलोग, मैं, भैया बलरामजी, सारे द्वारकावासी, सम्पूर्ण चराचर जगत्—सब-के-सब आपने जैसा कहा, वैसे ही हैं, सबको ब्रह्मरूप ही समझना चाहिये॥ २३॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रियो ममाचार्य।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 655)

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें