दैत्यराज बलिने कहा—बलरामजी! आप अनन्त हैं। आप इतने महान् हैं कि शेष आदि सभी विग्रह आपके अन्तर्भूत हैं। सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण! आप सकल जगत्के निर्माता हैं। ज्ञानयोग और भक्तियोग दोनोंके प्रवर्तक आप ही हैं। आप स्वयं ही परब्रह्म परमात्मा हैं। हम आप दोनोंको बार-बार नमस्कार करते हैं॥ ३९॥
नमोऽनन्ताय बृहते नमः कृष्णाय वेधसे।
सांख्ययोगवितानाय ब्रह्मणे परमात्मने॥ ३९
दैत्यराज बलिने कहा—बलरामजी! आप अनन्त हैं। आप इतने महान् हैं कि शेष आदि सभी विग्रह आपके अन्तर्भूत हैं। सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण! आप सकल जगत्के निर्माता हैं। ज्ञानयोग और भक्तियोग दोनोंके प्रवर्तक आप ही हैं। आप स्वयं ही परब्रह्म परमात्मा हैं। हम आप दोनोंको बार-बार नमस्कार करते हैं॥ ३९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.85.39 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 657) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/85/39/