भगवन्! आप दोनोंका दर्शन प्राणियोंके लिये अत्यन्त दुर्लभ है। फिर भी आपकी कृपासे वह सुलभ हो जाता है। क्योंकि आज आपने कृपा करके हम रजोगुणी एवं तमोगुणी स्वभाववाले दैत्योंको भी दर्शन दिया है॥ ४०॥
दर्शनं वां हि भूतानां दुष्प्रापं चाप्यदुर्लभम्।
रजस्तमःस्वभावानां यन्नः प्राप्तौ यदृच्छया॥ ४०
भगवन्! आप दोनोंका दर्शन प्राणियोंके लिये अत्यन्त दुर्लभ है। फिर भी आपकी कृपासे वह सुलभ हो जाता है। क्योंकि आज आपने कृपा करके हम रजोगुणी एवं तमोगुणी स्वभाववाले दैत्योंको भी दर्शन दिया है॥ ४०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.85.40 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 657) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/85/40/