श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.85.40

दशम स्कन्ध · अध्याय 85 · अथ पञ्चाशीतितमोऽध्यायः

दर्शनं वां हि भूतानां दुष्प्रापं चाप्यदुर्लभम्।

रजस्तमःस्वभावानां यन्‍नः प्राप्तौ यदृच्छया॥ ४०

darśanaṃ vāṃ hi bhūtānāṃ duṣprāpaṃ cāpyadurlabham|

rajastamaḥsvabhāvānāṃ yannaḥ prāptau yadṛcchayā|| 40

अर्थ

भगवन्! आप दोनोंका दर्शन प्राणियोंके लिये अत्यन्त दुर्लभ है। फिर भी आपकी कृपासे वह सुलभ हो जाता है। क्योंकि आज आपने कृपा करके हम रजोगुणी एवं तमोगुणी स्वभाववाले दैत्योंको भी दर्शन दिया है॥ ४०॥

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