श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.85.43

दशम स्कन्ध · अध्याय 85 · अथ पञ्चाशीतितमोऽध्यायः

केचनोद्बद्धवैरेण भक्त्या केचन कामतः।

न तथा सत्त्वसंरब्धाः सन्‍निकृष्टाः सुरादयः॥ ४३

kecanodbaddhavaireṇa bhaktyā kecana kāmataḥ|

na tathā sattvasaṃrabdhāḥ sannikṛṣṭāḥ surādayaḥ|| 43

अर्थ

प्रभो! हम और हमारे ही समान दूसरे दैत्य, दानव, गन्धर्व, सिद्ध, विद्याधर, चारण, यक्ष, राक्षस, पिशाच, भूत और प्रमथनायक आदि आपका प्रेमसे भजन करना तो दूर रहा, आपसे सर्वदा दृढ़ वैरभाव रखते हैं; परन्तु आपका श्रीविग्रह साक्षात् वेदमय और विशुद्ध सत्त्वस्वरूप है। इसलिये हमलोगोंमेंसे बहुतोंने दृढ़ वैरभावसे, कुछने भक्तिसे और कुछने कामनासे आपका स्मरण करके उस पदको प्राप्त किया है, जिसे आपके समीप रहनेवाले सत्त्वप्रधान देवता आदि भी नहीं प्राप्त कर सकते॥ ४१—४३॥

यह अर्थ श्लोक 41–43 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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