॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.85.46
शाध्यस्मानीशितव्येश निष्पापान् कुरु नः प्रभो।
पुमान् यच्छ्रद्धयाऽऽतिष्ठंश्चोदनाया विमुच्यते॥ ४६
śādhyasmānīśitavyeśa niṣpāpān kuru naḥ prabho|
pumān yacchraddhayā''tiṣṭhaṃścodanāyā vimucyate|| 46
अर्थ
प्रभो! आप समस्त चराचर जगत्के नियन्ता और स्वामी हैं। आप हमें आज्ञा देकर निष्पाप बनाइये, हमारे पापोंका नाश कर दीजिये; क्योंकि जो पुरुष श्रद्धाके साथ आपकी आज्ञाका पालन करता है, वह विधि-निषेधके बन्धनसे मुक्त हो जाता है॥ ४६॥