॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.85.45
तन्नः प्रसीद निरपेक्षविमृग्ययुष्मत्-
पादारविन्दधिषणान्यगृहान्धकूपात्।
निष्क्रम्य विश्वशरणाङ्घ्र्युपलब्धवृत्तिः ✎ 2138
शान्तो यथैक उत सर्वसखैश्चरामि॥ ४५
tannaḥ prasīda nirapekṣavimṛgyayuṣmat-
pādāravindadhiṣaṇānyagṛhāndhakūpāt|
niṣkramya viśvaśaraṇāṅghryupalabdhavṛttiḥ
śānto yathaika uta sarvasakhaiścarāmi|| 45
अर्थ
इसलिये स्वामी! मुझपर ऐसी कृपा कीजिये कि मेरी चित्त-वृत्ति आपके उन चरणकमलोंमें लग जाय, जिसे किसीकी अपेक्षा न रखनेवाले परमहंस लोग ढूँढ़ा करते हैं; और उनका आश्रय लेकर मैं उससे भिन्न इस घर-गृहस्थीके अँधेरे कूएँसे निकल जाऊँ। प्रभो! इस प्रकार आपके उन चरणकमलोंकी, जो सारे जगत्के एकमात्र आश्रय हैं, शरण लेकर शान्त हो जाऊँ और अकेला ही विचरण करूँ। यदि कभी किसीका संग करना ही पड़े तो सबके परम हितैषी संतोंका ही॥ ४५॥