उन बालकोंको देखकर देवी देवकीके हृदयमें वात्सल्य-स्नेहकी बाढ़ आ गयी। उनके स्तनोंसे दूध बहने लगा। वे बार-बार उन्हें गोदमें लेकर छातीसे लगातीं और उनका सिर सूँघतीं॥ ५३॥✎ 1719
तान् दृष्ट्वा बालकान् देवी पुत्रस्नेहस्नुतस्तनी।
परिष्वज्यांकमारोप्य मूर्ध्न्यजिघ्रदभीक्ष्णशः॥ ५३
उन बालकोंको देखकर देवी देवकीके हृदयमें वात्सल्य-स्नेहकी बाढ़ आ गयी। उनके स्तनोंसे दूध बहने लगा। वे बार-बार उन्हें गोदमें लेकर छातीसे लगातीं और उनका सिर सूँघतीं॥ ५३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.85.53 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 659) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/85/53/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)