श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.85.53

दशम स्कन्ध · अध्याय 85 · अथ पञ्चाशीतितमोऽध्यायः

तान् दृष्ट्वा बालकान् देवी पुत्रस्नेहस्नुतस्तनी।

परिष्वज्यांकमारोप्य मूर्ध्‍न्‍यजिघ्रदभीक्ष्णशः॥ ५३

tān dṛṣṭvā bālakān devī putrasnehasnutastanī|

pariṣvajyāṃkamāropya mūrdhnyajighradabhīkṣṇaśaḥ|| 53

अर्थ

उन बालकोंको देखकर देवी देवकीके हृदयमें वात्सल्य-स्नेहकी बाढ़ आ गयी। उनके स्तनोंसे दूध बहने लगा। वे बार-बार उन्हें गोदमें लेकर छातीसे लगातीं और उनका सिर सूँघतीं॥ ५३॥✎ 1719

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1719 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: असुर-योनिमें → असुरयोनिमें

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