पुत्रोंके स्पर्शके आनन्दसे सराबोर एवं आनन्दित देवकीने उनको स्तन-पान कराया। वे विष्णुभगवान्की उस मायासे मोहित हो रही थीं, जिससे यह सृष्टि-चक्र चलता है॥ ५४॥✎ 1719
अपाययत् स्तनं प्रीता सुतस्पर्शपरिप्लुता।
मोहिता मायया विष्णोर्यया सृष्टिः प्रवर्तते॥ ५४
पुत्रोंके स्पर्शके आनन्दसे सराबोर एवं आनन्दित देवकीने उनको स्तन-पान कराया। वे विष्णुभगवान्की उस मायासे मोहित हो रही थीं, जिससे यह सृष्टि-चक्र चलता है॥ ५४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.85.54 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 659) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/85/54/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)