श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.85.58

दशम स्कन्ध · अध्याय 85 · अथ पञ्चाशीतितमोऽध्यायः

एवंविधान्यद्भुतानि कृष्णस्य परमात्मनः।

वीर्याण्यनन्तवीर्यस्य सन्त्यनन्तानि भारत॥ ५८

evaṃvidhānyadbhutāni kṛṣṇasya paramātmanaḥ|

vīryāṇyanantavīryasya santyanantāni bhārata|| 58

अर्थ

परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं परमात्मा हैं, उनकी शक्ति अनन्त है। उनके ऐसे-ऐसे अद्भुत चरित्र इतने हैं कि किसी प्रकार उनका पार नहीं पाया जा सकता॥ ५८॥✎ 1719

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1719 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: असुर-योनिमें → असुरयोनिमें

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