श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.85.8

दशम स्कन्ध · अध्याय 85 · अथ पञ्चाशीतितमोऽध्यायः

तर्पणं प्राणनमपां देव त्वं ताश्‍च तद्रसः।

ओजः सहो बलं चेष्टा गतिर्वायोस्तवेश्‍वर॥ ८

tarpaṇaṃ prāṇanamapāṃ deva tvaṃ tāśca tadrasaḥ|

ojaḥ saho balaṃ ceṣṭā gatirvāyostaveśvara|| 8

अर्थ

परमेश्‍वर! जलमें तृप्त करने, जीवन देने और शुद्ध करनेकी जो शक्तियाँ हैं, वे तुम्हारा ही स्वरूप हैं। जल और उसका रस भी तुम्हीं हो। प्रभो! इन्द्रियशक्ति, अन्तःकरणकी शक्ति, शरीरकी शक्ति, उसका हिलना-डोलना, चलना-फिरना—ये सब वायुकी शक्तियाँ तुम्हारी ही हैं॥ ८॥

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