॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.85.9
दिशां त्वमवकाशोऽसि दिशः खं स्फोट आश्रयः।
नादो वर्णस्त्वमोंकार आकृतीनां पृथक्कृतिः॥ ९
diśāṃ tvamavakāśo'si diśaḥ khaṃ sphoṭa āśrayaḥ|
nādo varṇastvamoṃkāra ākṛtīnāṃ pṛthakkṛtiḥ|| 9
अर्थ
दिशाएँ और उनके अवकाश भी तुम्हीं हो। आकाश और उसका आश्रयभूत स्फोट—शब्दतन्मात्रा या परा वाणी, नाद—पश्यन्ती, ओंकार—मध्यमा तथा वर्ण (अक्षर) एवं पदार्थोंका अलग-अलग निर्देश करनेवाले पद, रूप, वैखरी वाणी भी तुम्हीं हो॥ ९॥