श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.86.2

दशम स्कन्ध · अध्याय 86 · अथ षडशीतितमोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

अर्जुनस्तीर्थयात्रायां पर्यटन्‍नवनीं प्रभुः।

गतः प्रभासमशृणोन्मातुलेयीं स आत्मनः॥ २

arjunastīrthayātrāyāṃ paryaṭannavanīṃ prabhuḥ|

gataḥ prabhāsamaśṛṇonmātuleyīṃ sa ātmanaḥ|| 2

अर्थ

श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्! एक बार अत्यन्त शक्तिशाली अर्जुन तीर्थयात्राके लिये पृथ्वीपर विचरण करते हुए प्रभासक्षेत्र पहुँचे। वहाँ उन्होंने यह सुना कि बलरामजी मेरे मामाकी पुत्री सुभद्राका विवाह दुर्योधनके साथ करना चाहते हैं और वसुदेव, श्रीकृष्ण आदि उनसे इस विषयमें सहमत नहीं हैं। अब अर्जुनके मनमें सुभद्राको पानेकी लालसा जग आयी। वे त्रिदण्डी वैष्णवका वेष धारण करके द्वारका पहुँचे॥ २-३॥

यह अर्थ श्लोक 2–3 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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