तल्लिप्सुः स यतिर्भूत्वा त्रिदण्डी द्वारकामगात्॥ ३
duryodhanāya rāmastāṃ dāsyatīti na cāpare|
tallipsuḥ sa yatirbhūtvā tridaṇḍī dvārakāmagāt|| 3
अर्थ
श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्! एक बार अत्यन्त शक्तिशाली अर्जुन तीर्थयात्राके लिये पृथ्वीपर विचरण करते हुए प्रभासक्षेत्र पहुँचे। वहाँ उन्होंने यह सुना कि बलरामजी मेरे मामाकी पुत्री सुभद्राका विवाह दुर्योधनके साथ करना चाहते हैं और वसुदेव, श्रीकृष्ण आदि उनसे इस विषयमें सहमत नहीं हैं। अब अर्जुनके मनमें सुभद्राको पानेकी लालसा जग आयी। वे त्रिदण्डी वैष्णवका वेष धारण करके द्वारका पहुँचे॥ २-३॥
यह अर्थ श्लोक 2–3 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।
दुर्योधनाय रामस्तां दास्यतीति न चापरे।
तल्लिप्सुः स यतिर्भूत्वा त्रिदण्डी द्वारकामगात्॥ ३
श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्! एक बार अत्यन्त शक्तिशाली अर्जुन तीर्थयात्राके लिये पृथ्वीपर विचरण करते हुए प्रभासक्षेत्र पहुँचे। वहाँ उन्होंने यह सुना कि बलरामजी मेरे मामाकी पुत्री सुभद्राका विवाह दुर्योधनके साथ करना चाहते हैं और वसुदेव, श्रीकृष्ण आदि उनसे इस विषयमें सहमत नहीं हैं। अब अर्जुनके मनमें सुभद्राको पानेकी लालसा जग आयी। वे त्रिदण्डी वैष्णवका वेष धारण करके द्वारका पहुँचे॥ २-३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.86.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 660) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/86/3/