स्वयंप्रकाश प्रभो! हम आपके सेवक हैं। हमें आज्ञा दीजिये कि हम आपकी क्या सेवा करें? नेत्रोंके द्वारा आपका दर्शन होनेतक ही जीवोंके क्लेश रहते हैं। आपके दर्शनमें ही समस्त क्लेशोंकी परिसमाप्ति है॥ ४९॥
स त्वं शाधि स्वभृत्यान् नः किं देव करवामहे।
एतदन्तो नृणां क्लेशो यद् भवानक्षिगोचरः॥ ४९
स्वयंप्रकाश प्रभो! हम आपके सेवक हैं। हमें आज्ञा दीजिये कि हम आपकी क्या सेवा करें? नेत्रोंके द्वारा आपका दर्शन होनेतक ही जीवोंके क्लेश रहते हैं। आपके दर्शनमें ही समस्त क्लेशोंकी परिसमाप्ति है॥ ४९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.86.49 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 666) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/86/49/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1203 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नॄणां → नृणां