श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! शरणागतभयहारी भगवान् श्रीकृष्णने श्रुतदेवकी प्रार्थना सुनकर अपने हाथसे उनका हाथ पकड़ लिया और मुसकराते हुए कहा॥ ५०॥✎ 1720
तदुक्तमित्युपाकर्ण्य भगवान् प्रणतार्तिहा।
गृहीत्वा पाणिना पाणिं प्रहसंस्तमुवाच ह॥ ५०
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! शरणागतभयहारी भगवान् श्रीकृष्णने श्रुतदेवकी प्रार्थना सुनकर अपने हाथसे उनका हाथ पकड़ लिया और मुसकराते हुए कहा॥ ५०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.86.50 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 666) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/86/50/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)