श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.87.45

दशम स्कन्ध · अध्याय 87 · अथ सप्ताशीतितमोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

एवं स ऋषिणाऽऽदिष्टं गृहीत्वा श्रद्धयाऽऽत्मवान्।

पूर्णः श्रुतधरो राजन्‍नाह वीरव्रतो मुनिः॥ ४५

evaṃ sa ṛṣiṇā''diṣṭaṃ gṛhītvā śraddhayā''tmavān|

pūrṇaḥ śrutadharo rājannāha vīravrato muniḥ|| 45

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! देवर्षि नारद बड़े संयमी, ज्ञानी, पूर्णकाम और नैष्ठिक ब्रह्मचारी हैं। वे जो कुछ सुनते हैं, उन्हें उसकी धारणा हो जाती है। भगवान् नारायणने उन्हें जब इस प्रकार उपदेश किया, तब उन्होंने बड़ी श्रद्धासे उसे ग्रहण किया और उनसे यह कहा॥ ४५॥

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