परीक्षित्! इस प्रकार महात्मा देवर्षि नारद आदि ऋषि भगवान् नारायणको और उनके शिष्योंको नमस्कार करके स्वयं मेरे पिता श्रीकृष्णद्वैपायनके आश्रमपर गये॥ ४७॥
इत्याद्यमृषिमानम्य तच्छिष्यांश्च महात्मनः।
ततोऽगादाश्रमं साक्षात् पितुर्द्वैपायनस्य मे॥ ४७
परीक्षित्! इस प्रकार महात्मा देवर्षि नारद आदि ऋषि भगवान् नारायणको और उनके शिष्योंको नमस्कार करके स्वयं मेरे पिता श्रीकृष्णद्वैपायनके आश्रमपर गये॥ ४७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.87.47 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 687) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/87/47/