श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.88.2

दशम स्कन्ध · अध्याय 88 · अथाष्टाशीतितमोऽध्यायः

एतद् वेदितुमिच्छामः सन्देहोऽत्र महान् हि नः।

विरुद्धशीलयोः प्रभ्वोर्विरुद्धा भजतां गतिः॥ २

etad veditumicchāmaḥ sandeho'tra mahān hi naḥ|

viruddhaśīlayoḥ prabhvorviruddhā bhajatāṃ gatiḥ|| 2

अर्थ

दोनों प्रभु त्याग और भोगकी दृष्टिसे एक-दूसरेसे विरुद्ध स्वभाववाले हैं, परंतु उनके उपासकोंको उनके स्वरूपके विपरीत फल मिलता है। मुझे इस विषयमें बड़ा सन्देह है कि त्यागीकी उपासनासे भोग और लक्ष्मीपतिकी उपासनासे त्याग कैसे मिलता है? मैं आपसे यह जानना चाहता हूँ॥ २॥

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