श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.88.3

दशम स्कन्ध · अध्याय 88 · अथाष्टाशीतितमोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

शिवः शक्तियुतः शश्‍वत् त्रिलिंगो गुणसंवृतः।

वैकारिकस्तैजसश्‍च तामसश्‍चेत्यहं त्रिधा॥ ३

śivaḥ śaktiyutaḥ śaśvat triliṃgo guṇasaṃvṛtaḥ|

vaikārikastaijasaśca tāmasaścetyahaṃ tridhā|| 3

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! शिवजी सदा अपनी शक्तिसे युक्त रहते हैं। वे सत्त्व आदि गुणोंसे युक्त तथा अहंकारके अधिष्ठाता हैं। अहंकारके तीन भेद हैं—वैकारिक, तैजस और तामस॥ ३॥✎ 896

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #896 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से

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