त्रिविध अहंकारसे सोलह विकार हुए—दस इन्द्रियाँ, पाँच महाभूत और एक मन। अतः इन सबके अधिष्ठातृ-देवताओंमेंसे किसी एककी उपासना करनेपर समस्त ऐश्वर्योंकी प्राप्ति हो जाती है॥ ४॥✎ 896
ततो विकारा अभवन् षोडशामीषु कंचन।
उपधावन् विभूतीनां सर्वासामश्नुते गतिम्॥ ४
त्रिविध अहंकारसे सोलह विकार हुए—दस इन्द्रियाँ, पाँच महाभूत और एक मन। अतः इन सबके अधिष्ठातृ-देवताओंमेंसे किसी एककी उपासना करनेपर समस्त ऐश्वर्योंकी प्राप्ति हो जाती है॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.88.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 688) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/88/4/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)