॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.88.20
तमाह चांगालमलं वृणीष्व मे
यथाभिकामं वितरामि ते वरम्।
प्रीयेय तोयेन नृणां प्रपद्यता- ✎ 1205
महो त्वयाऽऽत्मा भृशमर्द्यते वृथा॥ २०
tamāha cāṃgālamalaṃ vṛṇīṣva me
yathābhikāmaṃ vitarāmi te varam|
prīyeya toyena nṛṇāṃ prapadyatā-
maho tvayā''tmā bhṛśamardyate vṛthā|| 20
अर्थ
भगवान् शंकरने वृकासुरसे कहा—‘प्यारे वृकासुर! बस करो, बस करो; बहुत हो गया। मैं तुम्हें वर देना चाहता हूँ। तुम मुँहमाँगा वर माँग लो। अरे भाई! मैं तो अपने शरणागत भक्तोंपर केवल जल चढ़ानेसे ही सन्तुष्ट हो जाया करता हूँ। भला, तुम झूठ-मूठ अपने शरीरको क्यों पीड़ा दे रहे हो?’॥ २०॥