परीक्षित्! भगवान्ने ऐसी मोहित करनेवाली अद्भुत और मीठी बात कही कि उसकी विवेक-बुद्धि जाती रही। उस दुर्बुद्धिने भूलकर अपने ही सिरपर हाथ रख लिया॥ ३५॥
इत्थं भगवतश्चित्रैर्वचोभिः स सुपेशलैः।
भिन्नधीर्विस्मृतः शीर्ष्णि स्वहस्तं कुमतिर्व्यधात्॥ ३५
परीक्षित्! भगवान्ने ऐसी मोहित करनेवाली अद्भुत और मीठी बात कही कि उसकी विवेक-बुद्धि जाती रही। उस दुर्बुद्धिने भूलकर अपने ही सिरपर हाथ रख लिया॥ ३५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.88.35 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 692) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/88/35/