श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.89.20

दशम स्कन्ध · अध्याय 89 · अथैकोननवतितमोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

एवं सारस्वता विप्रा नृणां संशयनुत्तये।✎ 1207

पुरुषस्य पदाम्भोजसेवया तद्गतिं गताः॥ २०

evaṃ sārasvatā viprā nṛṇāṃ saṃśayanuttaye|

puruṣasya padāmbhojasevayā tadgatiṃ gatāḥ|| 20

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! सरस्वती-तटके ऋषियोंने अपने लिये नहीं, मनुष्योंका संशय मिटानेके लिये ही ऐसी युक्ति रची थी। पुरुषोत्तम भगवान्‌के चरणकमलोंकी सेवा करके उन्होंने उनका परमपद प्राप्त किया॥ २०॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1207 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नॄणां → नृणां

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें