॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.89.21
सूत उवाच
इत्येतन्मुनितनयास्यपद्मगन्ध-
पीयूषं भवभयभित् परस्य पुंसः।
सुश्लोकं श्रवणपुटैः पिबत्यभीक्ष्णं
पान्थोऽध्वभ्रमणपरिश्रमं जहाति॥ २१
ityetanmunitanayāsyapadmagandha-
pīyūṣaṃ bhavabhayabhit parasya puṃsaḥ|
suślokaṃ śravaṇapuṭaiḥ pibatyabhīkṣṇaṃ
pāntho'dhvabhramaṇapariśramaṃ jahāti|| 21
अर्थ
सूतजी कहते हैं—शौनकादि ऋषियो! भगवान् पुरुषोत्तमकी यह कमनीय कीर्ति-कथा जन्म-मृत्युरूप संसारके भयको मिटानेवाली है। यह व्यासनन्दन भगवान् श्रीशुकदेवजीके मुखारविन्दसे निकली हुई सुरभिमयी मधुमयी सुधाधारा है। इस संसारके लंबे पथका जो बटोही अपने कानोंके दोनोंसे इसका निरन्तर पान करता रहता है, उसकी सारी थकावट, जो जगत्में इधर-उधर भटकनेसे होती है, दूर हो जाती है॥ २१॥