श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.89.35

दशम स्कन्ध · अध्याय 89 · अथैकोननवतितमोऽध्यायः

एवं विश्रम्भितो विप्रः फाल्गुनेन परंतप।

जगाम स्वगृहं प्रीतः पार्थवीर्यं निशामयन्॥ ३५

evaṃ viśrambhito vipraḥ phālgunena paraṃtapa|

jagāma svagṛhaṃ prītaḥ pārthavīryaṃ niśāmayan|| 35

अर्थ

परीक्षित्! जब अर्जुनने उस ब्राह्मणको इस प्रकार विश्‍वास दिलाया, तब वह लोगोंसे उनके बल-पौरुषका बखान करता हुआ बड़ी प्रसन्‍नतासे अपने घर लौट गया॥ ३५॥

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