परीक्षित्! जब अर्जुनने उस ब्राह्मणको इस प्रकार विश्वास दिलाया, तब वह लोगोंसे उनके बल-पौरुषका बखान करता हुआ बड़ी प्रसन्नतासे अपने घर लौट गया॥ ३५॥
एवं विश्रम्भितो विप्रः फाल्गुनेन परंतप।
जगाम स्वगृहं प्रीतः पार्थवीर्यं निशामयन्॥ ३५
परीक्षित्! जब अर्जुनने उस ब्राह्मणको इस प्रकार विश्वास दिलाया, तब वह लोगोंसे उनके बल-पौरुषका बखान करता हुआ बड़ी प्रसन्नतासे अपने घर लौट गया॥ ३५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.89.35 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 697) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/89/35/