श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.89.56

दशम स्कन्ध · अध्याय 89 · अथैकोननवतितमोऽध्यायः

महामणिव्रातकिरीटकुण्डल-

प्रभापरिक्षिप्तसहस्रकुन्तलम् ।

प्रलम्बचार्वष्टभुजं सकौस्तुभं

श्रीवत्सलक्ष्मं वनमालया वृतम्॥ ५६

mahāmaṇivrātakirīṭakuṇḍala-

prabhāparikṣiptasahasrakuntalam |

pralambacārvaṣṭabhujaṃ sakaustubhaṃ

śrīvatsalakṣmaṃ vanamālayā vṛtam|| 56

अर्थ

बहुमूल्य मणियोंसे जटित मुकुट और कुण्डलोंकी कान्तिसे सहस्रों घुँघराली अलकें चमक रही हैं। लंबी-लंबी, सुन्दर आठ भुजाएँ हैं; गलेमें कौस्तुभ मणि है; वक्षःस्थलपर श्रीवत्सका चिह्न है और घुटनोंतक वनमाला लटक रही है॥ ५६॥

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