श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.89.57

दशम स्कन्ध · अध्याय 89 · अथैकोननवतितमोऽध्यायः

सुनन्दनन्दप्रमुखैः स्वपार्षदै-

श्‍चक्रादिभिर्मूर्तिधरैर्निजायुधैः ।

पुष्ट्या श्रिया कीर्त्यजयाखिलर्द्धिभि-

र्निषेव्यमाणं परमेष्ठिनां पतिम्॥ ५७

sunandanandapramukhaiḥ svapārṣadai-

ścakrādibhirmūrtidharairnijāyudhaiḥ |

puṣṭyā śriyā kīrtyajayākhilarddhibhi-

rniṣevyamāṇaṃ parameṣṭhināṃ patim|| 57

अर्थ

अर्जुनने देखा कि उनके नन्द-सुनन्द आदि अपने पार्षद, चक्र-सुदर्शन आदि अपने मूर्तिमान् आयुध तथा पुष्टि, श्री, कीर्ति और अजा—ये चारों शक्तियाँ एवं सम्पूर्ण ऋद्धियाँ ब्रह्मादि लोकपालोंके अधीश्‍वर भगवान्‌की सेवा कर रही हैं॥ ५७॥

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