भगवान् विष्णुके उस परमधामको देखकर अर्जुनके आश्चर्यकी सीमा न रही। उन्होंने ऐसा अनुभव किया कि जीवोंमें जो कुछ बल-पौरुष है, वह सब भगवान् श्रीकृष्णकी ही कृपाका फल है॥ ६३॥
निशाम्य वैष्णवं धाम पार्थः परमविस्मितः।
यत्किंचित् पौरुषं पुंसां मेने कृष्णानुकम्पितम्॥ ६३
भगवान् विष्णुके उस परमधामको देखकर अर्जुनके आश्चर्यकी सीमा न रही। उन्होंने ऐसा अनुभव किया कि जीवोंमें जो कुछ बल-पौरुष है, वह सब भगवान् श्रीकृष्णकी ही कृपाका फल है॥ ६३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.89.63 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 700) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/89/63/