॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.9.5
तमंकमारूढमपाययत् स्तनं
स्नेहस्नुतं सस्मितमीक्षती मुखम्।
अतृप्तमुत्सृज्य जवेन सा यया-
वुत्सिच्यमाने पयसि त्वधिश्रिते॥ ५
tamaṃkamārūḍhamapāyayat stanaṃ
snehasnutaṃ sasmitamīkṣatī mukham|
atṛptamutsṛjya javena sā yayā-
vutsicyamāne payasi tvadhiśrite|| 5
अर्थ
श्रीकृष्ण माता यशोदाकी गोदमें चढ़ गये। वात्सल्य-स्नेहकी अधिकतासे उनके स्तनोंसे दूध तो स्वयं झर ही रहा था। वे उन्हें पिलाने लगीं और मन्द-मन्द मुसकानसे युक्त उनका मुख देखने लगीं। इतनेमें ही दूसरी ओर अँगीठीपर रखे हुए दूधमें उफान आया। उसे देखकर यशोदाजी उन्हें अतृप्त ही छोड़कर जल्दीसे दूध उतारनेके लिये चली गयीं*॥ ५॥
टिप्पणियाँ
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मैया मना करती रही—‘नेक-सा माखन तो निकाल लेने दे।’ ‘ऊँ-ऊँ-ऊँ, मैं तो दूध पीऊँगा’—दोनों हाथोंसे मैयाकी कमर पकड़कर एक पाँव घुटनेपर रखा और गोदमें चढ़ गये। स्तनका दूध बरस पड़ा। मैया दूध पिलाने लगी, लाला मुसकराने लगे, आँखें मुसकानपर जम गयीं। ‘ईक्षती’ पदका यह अभिप्राय है कि जब लाला मुँह उठाकर देखेगा और मेरी आँखें उसपर लगी मिलेंगी, तब उसे बड़ा सुख होगा।
सामने पद्मगन्धा गायका दूध गरम हो रहा था। उसने सोचा—‘स्नेहमयी मा यशोदाका दूध कभी कम न होगा, श्यामसुन्दरकी प्यास कभी बुझेगी नहीं! उनमें परस्पर होड़ लगी है। मैं बेचारा युग-युगका, जन्म-जन्मका श्यामसुन्दरके होठोंका स्पर्श करनेके लिये व्याकुल तप-तपकर मर रहा हूँ। अब इस जीवनसे क्या लाभ जो श्रीकृष्णके काम न आवे। इससे अच्छा है उनकी आँखोंके सामने आगमें कूद पड़ना।’ माके नेत्र पहुँच गये। दयार्द्र माको श्रीकृष्णका भी ध्यान न रहा; उन्हें एक ओर डालकर दौड़ पड़ी। भक्त भगवान्को एक ओर रखकर भी दुःखियोंकी रक्षा करते हैं। भगवान् अतृप्त ही रह गये। क्या भक्तोंके हृदय-रससे, स्नेहसे उन्हें कभी तृप्ति हो सकती है? उसी दिनसे उनका एक नाम हुआ—‘अतृप्त’।