श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.90.15

दशम स्कन्ध · अध्याय 90 · अथ नवतितमोऽध्यायः

महिष्य ऊचुः

कुररि विलपसि त्वं वीतनिद्रा न शेषे

स्वपिति जगति रात्र्यामीश्‍वरो गुप्तबोधः।

वयमिव सखि कच्चिद् गाढनिर्भिन्‍नचेता

नलिननयनहासोदारलीलेक्षितेन ॥ १५

kurari vilapasi tvaṃ vītanidrā na śeṣe

svapiti jagati rātryāmīśvaro guptabodhaḥ|

vayamiva sakhi kaccid gāḍhanirbhinnacetā

nalinanayanahāsodāralīlekṣitena || 15

अर्थ

रानियाँ कहतीं—अरी कुररी! अब तो बड़ी रात हो गयी है। संसारमें सब ओर सन्‍नाटा छा गया है। देख, इस समय स्वयं भगवान् अपना अखण्ड बोध छिपाकर सो रहे हैं और तुझे नींद ही नहीं आती? तू इस तरह रात-रातभर जगकर विलाप क्यों कर रही है? सखी! कहीं कमलनयन भगवान्‌के मधुर हास्य और लीलाभरी उदार (स्वीकृतिसूचक) चितवनसे तेरा हृदय भी हमारी ही तरह बिंध तो नहीं गया है?॥ १५॥

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