श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.90.16

दशम स्कन्ध · अध्याय 90 · अथ नवतितमोऽध्यायः

नेत्रे निमीलयसि नक्तमदृष्टबन्धु-

स्त्वं रोरवीषि करुणं बत चक्रवाकि।

दास्यं गता वयमिवाच्युतपादजुष्टां

किं वा स्रजं स्पृहयसे कबरेण वोढुम्॥ १६

netre nimīlayasi naktamadṛṣṭabandhu-

stvaṃ roravīṣi karuṇaṃ bata cakravāki|

dāsyaṃ gatā vayamivācyutapādajuṣṭāṃ

kiṃ vā srajaṃ spṛhayase kabareṇa voḍhum|| 16

अर्थ

अरी चकवी! तूने रातके समय अपने नेत्र क्यों बंद कर लिये हैं? क्या तेरे पतिदेव कहीं विदेश चले गये हैं कि तू इस प्रकार करुण स्वरसे पुकार रही है? हाय-हाय! तब तो तू बड़ी दुःखिनी है। परन्तु हो-न-हो तेरे हृदयमें भी हमारे ही समान भगवान्‌की दासी होनेका भाव जग गया है। क्या अब तू उनके चरणोंपर चढ़ायी हुई पुष्पोंकी माला अपनी चोटियोंमें धारण करना चाहती है?॥ १६॥

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