श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.90.20

दशम स्कन्ध · अध्याय 90 · अथ नवतितमोऽध्यायः

मेघ श्रीमंस्त्वमसि दयितो यादवेन्द्रस्य नूनं

श्रीवत्सांकं वयमिव भवान् ध्यायति प्रेमबद्धः।

अत्युत्कण्ठः शबलहृदयोऽस्मद्विधो बाष्पधाराः

स्मृत्वा स्मृत्वा विसृजसि मुहुर्दुःखदस्तत्प्रसंगः॥ २०

megha śrīmaṃstvamasi dayito yādavendrasya nūnaṃ

śrīvatsāṃkaṃ vayamiva bhavān dhyāyati premabaddhaḥ|

atyutkaṇṭhaḥ śabalahṛdayo'smadvidho bāṣpadhārāḥ

smṛtvā smṛtvā visṛjasi muhurduḥkhadastatprasaṃgaḥ|| 20

अर्थ

श्रीमन् मेघ! तुम्हारे शरीरका सौन्दर्य तो हमारे प्रियतम-जैसा ही है। अवश्य ही तुम यदुवंशशिरोमणि भगवान्‌के परम प्यारे हो। तभी तो तुम हमारी ही भाँति प्रेमपाशमें बँधकर उनका ध्यान कर रहे हो! देखो-देखो! तुम्हारा हृदय चिन्तासे भर रहा है, तुम उनके लिये अत्यन्त उत्कण्ठित हो रहे हो! तभी तो बार-बार उनकी याद करके हमारी ही भाँति आँसूकी धारा बहा रहे हो। श्यामघन! सचमुच घनश्यामसे नाता जोड़ना घर बैठे पीड़ा मोल लेना है॥ २०॥

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