इसीलिये वे गृहस्थोचित श्रेष्ठ धर्मका आश्रय लेकर व्यवहार कर रहे थे। परीक्षित्! मैं तुमसे कह ही चुका हूँ कि उनकी रानियोंकी संख्या थी सोलह हजार एक सौ आठ॥ २९॥
आस्थितस्य परं धर्मं कृष्णस्य गृहमेधिनाम्।
आसन् षोडशसाहस्रं महिष्यश्च शताधिकम्॥ २९
इसीलिये वे गृहस्थोचित श्रेष्ठ धर्मका आश्रय लेकर व्यवहार कर रहे थे। परीक्षित्! मैं तुमसे कह ही चुका हूँ कि उनकी रानियोंकी संख्या थी सोलह हजार एक सौ आठ॥ २९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.90.29 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 706) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/90/29/