॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.10.20
को न्वर्थः सुखयत्येनं कामो वा मृत्युरन्तिके।
आघातं नीयमानस्य वध्यस्येव न तुष्टिदः॥ २०
ko nvarthaḥ sukhayatyenaṃ kāmo vā mṛtyurantike|
āghātaṃ nīyamānasya vadhyasyeva na tuṣṭidaḥ|| 20
अर्थ
जब मृत्यु उनके सिरपर नाच रही है तब ऐसी कौन-सी भोग-सामग्री या भोग-कामना है जो उन्हें सुखी कर सके? भला, जिस मनुष्यको फाँसीपर लटकानेके लिये वधस्थानपर ले जाया जा रहा है, उसे क्या फूल-चन्दन-स्त्री आदि पदार्थ सन्तुष्ट कर सकते हैं? कदापि नहीं। (अतः पूर्वोक्त मत माननेवालोंकी दृष्टिसे न सुख ही सिद्ध होगा और न जीवका कुछ पुरुषार्थ ही रहेगा)॥ २०॥