श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.12.12

एकादश स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

ता नाविदन् मय्यनुषंगबद्ध-

धियः स्वमात्मानमदस्तथेदम्।

यथा समाधौ मुनयोऽब्धितोये

नद्यः प्रविष्टा इव नामरूपे॥ १२

tā nāvidan mayyanuṣaṃgabaddha-

dhiyaḥ svamātmānamadastathedam|

yathā samādhau munayo'bdhitoye

nadyaḥ praviṣṭā iva nāmarūpe|| 12

अर्थ

जैसे बड़े-बड़े ऋषि-मुनि समाधिमें स्थित होकर तथा गंगा आदि बड़ी-बड़ी नदियाँ समुद्रमें मिलकर अपने नाम-रूप खो देती हैं, वैसे ही वे गोपियाँ परम प्रेमके द्वारा मुझमें इतनी तन्मय हो गयी थीं कि उन्हें लोक-परलोक, शरीर और अपने कहलानेवाले पति-पुत्रादिकी भी सुध-बुध नहीं रह गयी थी॥ १२॥

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