श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

एकादश स्कन्ध · अध्याय 12

24 श्लोक · 1 टिप्पणियाँ · एक-एक श्लोक पढ़ें →

मुद्रित ग्रन्थमें: द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 787–791

श्लोक-सूची
पृष्ठ 787

न रोधयति मां योगो न सांख्यं धर्म एव च।

न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो नेष्टापूर्तं न दक्षिणा॥ १ 11.12.1

व्रतानि यज्ञश्छन्दांसि तीर्थानि नियमा यमाः।

यथावरुन्धे सत्संगः सर्वसंगापहो हि माम्॥ २11.12.2

पृष्ठ 788

सत्संगेन हि दैतेया यातुधाना मृगाः खगाः।

गन्धर्वाप्सरसो नागाः सिद्धाश्‍चारणगुह्यकाः॥ ३ 11.12.3

विद्याधरा मनुष्येषु वैश्याः शूद्राः स्त्रियोऽन्त्यजाः।

रजस्तमःप्रकृतयस्तस्मिंस्तस्मिन् युगेऽनघ॥ ४11.12.4

बहवो मत्पदं प्राप्तास्त्वाष्ट्रकायाधवादयः।

वृषपर्वा बलिर्बाणो मयश्‍चाथ विभीषणः॥ ५11.12.5

सुग्रीवो हनुमानृक्षो गजो गृध्रो वणिक्पथः।

व्याधः कुब्जा व्रजे गोप्यो यज्ञपत्‍न्यस्तथापरे॥ ६11.12.6

ते नाधीतश्रुतिगणा नोपासितमहत्तमाः।

अव्रतातप्ततपसः सत्संगान्मामुपागताः॥ ७11.12.7

केवलेन हि भावेन गोप्यो गावो नगा मृगाः।

येऽन्ये मूढधियो नागाः सिद्धा मामीयुरञ्जसा॥ ८ 11.12.8

यं न योगेन सांख्येन दानव्रततपोऽध्वरैः।

व्याख्यास्वाध्यायसंन्यासैः प्राप्नुयाद् यत्‍नवानपि॥ ९11.12.9

रामेण सार्धं मथुरां प्रणीते

श्‍वाफल्किना मय्यनुरक्तचित्ताः।

विगाढभावेन न मे वियोग-

तीव्राधयोऽन्यं ददृशुः सुखाय॥ १०11.12.10

तास्ताः क्षपाः प्रेष्ठतमेन नीता

मयैव वृन्दावनगोचरेण।

क्षणार्धवत्ताः पुनरंग तासां

हीना मया कल्पसमा बभूवुः॥ ११11.12.11

पृष्ठ 789

ता नाविदन् मय्यनुषंगबद्ध-

धियः स्वमात्मानमदस्तथेदम्।

यथा समाधौ मुनयोऽब्धितोये

नद्यः प्रविष्टा इव नामरूपे॥ १२11.12.12

मत्कामा रमणं जारमस्वरूपविदोऽबलाः।

ब्रह्म मां परमं प्रापुः संगाच्छतसहस्रशः॥ १३11.12.13

तस्मात्त्वमुद्धवोत्सृज्य चोदनां प्रतिचोदनाम्।

प्रवृत्तं च निवृत्तं च श्रोतव्यं श्रुतमेव च॥ १४11.12.14

मामेकमेव शरणमात्मानं सर्वदेहिनाम्।

याहि सर्वात्मभावेन मया स्या ह्यकुतोभयः॥ १५11.12.15

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—प्रिय उद्धव! जगत‍्में जितनी आसक्तियाँ हैं, उन्हें सत्संग नष्ट कर देता है। यही कारण है कि सत्संग जिस प्रकार मुझे वशमें कर लेता है वैसा साधन न योग है न सांख्य, न धर्मपालन और न स्वाध्याय। तपस्या, त्याग, इष्टापूर्त्त और दक्षिणासे भी मैं वैसा प्रसन्‍न नहीं होता। कहाँतक कहूँ—व्रत, यज्ञ, वेद, तीर्थ और यम-नियम भी सत्संगके समान मुझे वशमें करनेमें समर्थ नहीं हैं॥ १-२॥ निष्पाप उद्धवजी! यह एक युगकी नहीं, सभी युगोंकी एक-सी बात है। सत्संगके द्वारा ही दैत्य-राक्षस, पशु-पक्षी, गन्धर्व-अप्सरा, नाग-सिद्ध, चारण-गुह्यक और विद्याधरोंको मेरी प्राप्ति हुई है। मनुष्योंमें वैश्य, शूद्र, स्त्री और अन्त्यज आदि रजोगुणी-तमोगुणी प्रकृतिके बहुत-से जीवोंने मेरा परमपद प्राप्त किया है। वृत्रासुर, प्रह्लाद, वृषपर्वा, बलि, बाणासुर, मयदानव, विभीषण, सुग्रीव, हनुमान्, जाम्बवान्, गजेन्द्र, जटायु, तुलाधार वैश्य, धर्मव्याध, कुब्जा, व्रजकी गोपियाँ, यज्ञपत्‍नियाँ और दूसरे लोग भी सत्संगके प्रभावसे ही मुझे प्राप्त कर सके हैं॥ ३—६॥ उन लोगोंने न तो वेदोंका स्वाध्याय किया था और न विधिपूर्वक महापुरुषोंकी उपासना की थी। इसी प्रकार उन्होंने कृच्छ्रचान्द्रायण आदि व्रत और कोई तपस्या भी नहीं की थी। बस, केवल सत्संगके प्रभावसे ही वे मुझे प्राप्त हो गये॥ ७॥ गोपियाँ, गायें, यमलार्जुन आदि वृक्ष, व्रजके हरिन आदि पशु, कालिय आदि नाग—ये तो साधन-साध्यके सम्बन्धमें सर्वथा ही मूढ़बुद्धि थे। इतने ही नहीं, ऐसे-ऐसे और भी बहुत हो गये हैं, जिन्होंने केवल प्रेमपूर्ण भावके द्वारा ही अनायास मेरी प्राप्ति कर ली और कृतकृत्य हो गये॥ ८॥ उद्धव! बड़े-बड़े प्रयत्‍नशील साधक योग, सांख्य, दान, व्रत, तपस्या, यज्ञ, श्रुतियोंकी व्याख्या, स्वाध्याय और संन्यास आदि साधनोंके द्वारा मुझे नहीं प्राप्त कर सकते; परन्तु सत्संगके द्वारा तो मैं अत्यन्त सुलभ हो जाता हूँ॥ ९॥ उद्धव! जिस समय अक्रूरजी भैया बलरामजीके साथ मुझे व्रजसे मथुरा ले आये, उस समय गोपियोंका हृदय गाढ़ प्रेमके कारण मेरे अनुरागके रंगमें रँगा हुआ था। मेरे वियोगकी तीव्र व्याधिसे वे व्याकुल हो रही थीं और मेरे अतिरिक्त कोई भी दूसरी वस्तु उन्हें सुखकारक नहीं जान पड़ती थी॥ १०॥ तुम जानते हो कि मैं ही उनका एकमात्र प्रियतम हूँ। जब मैं वृन्दावनमें था, तब उन्होंने बहुत-सी रात्रियाँ—वे रासकी रात्रियाँ मेरे साथ आधे क्षणके समान बिता दी थीं; परन्तु प्यारे उद्धव! मेरे बिना वे ही रात्रियाँ उनके लिये एक-एक कल्पके समान हो गयीं॥ ११॥ जैसे बड़े-बड़े ऋषि-मुनि समाधिमें स्थित होकर तथा गंगा आदि बड़ी-बड़ी नदियाँ समुद्रमें मिलकर अपने नाम-रूप खो देती हैं, वैसे ही वे गोपियाँ परम प्रेमके द्वारा मुझमें इतनी तन्मय हो गयी थीं कि उन्हें लोक-परलोक, शरीर और अपने कहलानेवाले पति-पुत्रादिकी भी सुध-बुध नहीं रह गयी थी॥ १२॥ उद्धव! उन गोपियोंमें बहुत-सी तो ऐसी थीं, जो मेरे वास्तविक स्वरूपको नहीं जानती थीं। वे मुझे भगवान् न जानकर केवल प्रियतम ही समझती थीं और जारभावसे मुझसे मिलनेकी आकांक्षा किया करती थीं। उन साधनहीन सैकड़ों, हजारों अबलाओंने केवल संगके प्रभावसे ही मुझ परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लिया॥ १३॥ इसलिये उद्धव! तुम श्रुति-स्मृति, विधि-निषेध, प्रवृत्ति-निवृत्ति और सुननेयोग्य तथा सुने हुए विषयका भी परित्याग करके सर्वत्र मेरी ही भावना करते हुए समस्त प्राणियोंके आत्मस्वरूप मुझ एककी ही शरण सम्पूर्ण रूपसे ग्रहण करो; क्योंकि मेरी शरणमें आ जानेसे तुम सर्वथा निर्भय हो जाओगे॥ १४-१५॥

पृष्ठ 789

उद्धव उवाच

संशयः शृण्वतो वाचं तव योगेश्‍वरेश्‍वर।

न निवर्तत आत्मस्थो येन भ्राम्यति मे मनः॥ १६11.12.16

उद्धवजीने कहा—सनकादि योगेश्‍वरोंके भी परमेश्‍वर प्रभो! यों तो मैं आपका उपदेश सुन रहा हूँ, परन्तु इससे मेरे मनका सन्देह मिट नहीं रहा है। मुझे स्वधर्मका पालन करना चाहिये या सब कुछ छोड़कर आपकी शरण ग्रहण करनी चाहिये, मेरा मन इसी दुविधामें लटक रहा है। आप कृपा करके मुझे भली-भाँति समझाइये॥ १६॥

श्रीभगवानुवाच

स एष जीवो विवरप्रसूतिः

प्राणेन घोषेण गुहां प्रविष्टः।

पृष्ठ 790

मनोमयं सूक्ष्ममुपेत्य रूपं

मात्रा स्वरो वर्ण इति स्थविष्ठः॥ १७11.12.17

यथानलः खेऽनिलबन्धुरूष्मा

बलेन दारुण्यधिमथ्यमानः।

अणुः प्रजातो हविषा समिध्यते

तथैव मे व्यक्तिरियं हि वाणी॥ १८11.12.18

एवं गदिः कर्म गतिर्विसर्गो

घ्राणो रसो दृक् स्पर्शः श्रुतिश्‍च।

संकल्पविज्ञानमथाभिमानः

सूत्रं रजःसत्त्वतमोविकारः॥ १९11.12.19

अयं हि जीवस्त्रिवृदब्जयोनि-

रव्यक्त एको वयसा स आद्यः।

विश्‍लिष्टशक्तिर्बहुधेव भाति

बीजानि योनिं प्रतिपद्य यद्वत्॥ २०11.12.20

यस्मिन्‍निदं प्रोतमशेषमोतं

पटो यथा तन्तुवितानसंस्थः।

य एष संसारतरुः पुराणः

कर्मात्मकः पुष्पफले प्रसूते॥ २१11.12.21

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—प्रिय उद्धव! जिस परमात्माका परोक्षरूपसे वर्णन किया जाता है, वे साक्षात् अपरोक्ष—प्रत्यक्ष ही हैं, क्योंकि वे ही निखिल वस्तुओंको सत्ता-स्फूर्ति—जीवन-दान करनेवाले हैं, वे ही पहले अनाहत नादस्वरूप परा वाणी नामक प्राणके साथ मूलाधारचक्रमें प्रवेश करते हैं। उसके बाद मणिपूरकचक्र (नाभि-स्थान) में आकर पश्यन्ती वाणीका मनोमय सूक्ष्मरूप धारण करते हैं। तदनन्तर कण्ठदेशमें स्थित विशुद्ध नामक चक्रमें आते हैं और वहाँ मध्यमा वाणीके रूपमें व्यक्त होते हैं। फिर क्रमशः मुखमें आकर ह्रस्व-दीर्घादि मात्रा, उदात्त-अनुदात्त आदि स्वर तथा ककारादि वर्णरूप स्थूल—वैखरी वाणीका रूप ग्रहण कर लेते हैं॥ १७॥ अग्‍नि आकाशमें ऊष्मा अथवा विद्युत्के रूपसे अव्यक्तरूपमें स्थित है। जब बलपूर्वक काष्ठमन्थन किया जाता है, तब वायुकी सहायतासे वह पहले अत्यन्त सूक्ष्म चिनगारीके रूपमें प्रकट होती है और फिर आहुति देनेपर प्रचण्ड रूप धारण कर लेती है, वैसे ही मैं भी शब्दब्रह्मस्वरूपसे क्रमशः परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी वाणीके रूपमें प्रकट होता हूँ॥ १८॥ इसी प्रकार बोलना, हाथोंसे काम करना, पैरोंसे चलना, मूत्रेन्द्रिय तथा गुदासे मल-मूत्र त्यागना, सूँघना, चखना, देखना, छूना, सुनना, मनसे संकल्प-विकल्प करना, बुद्धिसे समझना, अहंकारके द्वारा अभिमान करना, महत्तत्त्वके रूपमें सबका ताना-बाना बुनना तथा सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुणके सारे विकार; कहाँतक कहूँ—समस्त कर्ता, करण और कर्म मेरी ही अभिव्यक्तियाँ हैं॥ १९॥ यह सबको जीवित करनेवाला परमेश्‍वर ही इस त्रिगुणमय ब्रह्माण्ड-कमलका कारण है। यह आदि-पुरुष पहले एक और अव्यक्त था। जैसे उपजाऊ खेतमें बोया हुआ बीज शाखा-पत्र-पुष्पादि अनेक रूप धारण कर लेता है, वैसे ही कालगतिसे मायाका आश्रय लेकर शक्ति-विभाजनके द्वारा परमेश्‍वर ही अनेक रूपोंमें प्रतीत होने लगता है॥ २०॥ जैसे तागोंके ताने-बानेमें वस्त्र ओतप्रोत रहता है, वैसे ही यह सारा विश्‍व परमात्मामें ही ओतप्रोत है। जैसे सूतके बिना वस्त्रका अस्तित्व नहीं है; किन्तु सूत वस्त्रके बिना भी रह सकता है, वैसे ही इस जगत‍्के न रहनेपर भी परमात्मा रहता है; किन्तु यह जगत् परमात्मस्वरूप ही है—परमात्माके बिना इसका कोई अस्तित्व नहीं है। यह संसारवृक्ष अनादि और प्रवाहरूपसे नित्य है। इसका स्वरूप ही है—कर्मकी परम्परा तथा इस वृक्षके फल-फूल हैं—मोक्ष और भोग॥ २१॥

पृष्ठ 791

द्वे अस्य बीजे शतमूलस्त्रिनालः

पंचस्कन्धः पंचरसप्रसूतिः।

दशैकशाखो द्विसुपर्णनीड-

स्त्रिवल्कलो द्विफलोऽर्कं प्रविष्टः॥ २२11.12.22

अदन्ति चैकं फलमस्य गृध्रा

ग्रामेचरा एकमरण्यवासाः।

हंसा य एकं बहुरूपमिज्यै-

र्मायामयं वेद स वेद वेदम्॥ २३11.12.23

एवं गुरूपासनयैकभक्त्या

विद्याकुठारेण शितेन धीरः।

विवृश्‍च्य जीवाशयमप्रमत्तः

सम्पद्य चात्मानमथ त्यजास्त्रम्॥ २४11.12.24

पृष्ठ 791

इस संसारवृक्षके दो बीज हैं—पाप और पुण्य। असंख्य वासनाएँ जड़ें हैं और तीन गुण तने हैं। पाँच भूत इसकी मोटी-मोटी प्रधान शाखाएँ हैं और शब्दादि पाँच विषय रस हैं, ग्यारह इन्द्रियाँ शाखा हैं तथा जीव और ईश्‍वर—दो पक्षी इसमें घोंसला बनाकर निवास करते हैं। इस वृक्षमें वात, पित्त और कफरूप तीन तरहकी छाल है। इसमें दो तरहके फल लगते हैं—सुख और दुःख। यह विशाल वृक्ष सूर्यमण्डलतक फैला हुआ है (इस सूर्यमण्डलका भेदन कर जानेवाले मुक्त पुरुष फिर संसार-चक्रमें नहीं पड़ते)॥ २२॥ जो गृहस्थ शब्द-रूप-रस आदि विषयोंमें फँसे हुए हैं, वे कामनासे भरे हुए होनेके कारण गीधके समान हैं। वे इस वृक्षका दुःखरूप फल भोगते हैं, क्योंकि वे अनेक प्रकारके कर्मोंके बन्धनमें फँसे रहते हैं। जो अरण्यवासी परमहंस विषयोंसे विरक्त हैं, वे इस वृक्षमें राजहंसके समान हैं और वे इसका सुखरूप फल भोगते हैं। प्रिय उद्धव! वास्तवमें मैं एक ही हूँ। यह मेरा जो अनेकों प्रकारका रूप है, वह तो केवल मायामय है। जो इस बातको गुरुओंके द्वारा समझ लेता है, वही वास्तवमें समस्त वेदोंका रहस्य जानता है॥ २३॥ अतः उद्धव! तुम इस प्रकार गुरुदेवकी उपासनारूप अनन्य भक्तिके द्वारा अपने ज्ञानकी कुल्हाड़ीको तीखी कर लो और उसके द्वारा धैर्य एवं सावधानीसे जीवभावको काट डालो। फिर परमात्मस्वरूप होकर उस वृत्तिरूप अस्त्रोंको भी छोड़ दो और अपने अखण्ड स्वरूपमें ही स्थित हो रहो॥ २४॥*

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे
द्वादशोऽध्यायः॥ १२॥

टिप्पणियाँ

  1. *

    ईश्‍वर अपनी मायाके द्वारा प्रपंचरूपसे प्रतीत हो रहा है। इस प्रपंचके अध्यासके कारण ही जीवोंको अनादि अविद्यासे कर्तापन आदिकी भ्रान्ति होती है। फिर ‘यह करो, यह मत करो’ इस प्रकारके विधि-निषेधका अधिकार होता है। तब ‘अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये कर्म करो’—यह बात कही जाती है। जब अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है, तब कर्मसम्बन्धी दुराग्रह मिटानेके लिये यह बात कही जाती है कि भक्तिमें विक्षेप डालनेवाले कर्मोंके प्रति आदरभाव छोड़कर दृढ़ विश्‍वाससे भजन करो। तत्त्वज्ञान हो जानेपर कुछ भी कर्तव्य शेष नहीं रह जाता। यही इस प्रसंगका अभिप्राय है।

    (मुद्रित पृष्ठ 791)

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