॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.12.22
द्वे अस्य बीजे शतमूलस्त्रिनालः
पंचस्कन्धः पंचरसप्रसूतिः।
दशैकशाखो द्विसुपर्णनीड-
स्त्रिवल्कलो द्विफलोऽर्कं प्रविष्टः॥ २२
dve asya bīje śatamūlastrinālaḥ
paṃcaskandhaḥ paṃcarasaprasūtiḥ|
daśaikaśākho dvisuparṇanīḍa-
strivalkalo dviphalo'rkaṃ praviṣṭaḥ|| 22
अर्थ
इस संसारवृक्षके दो बीज हैं—पाप और पुण्य। असंख्य वासनाएँ जड़ें हैं और तीन गुण तने हैं। पाँच भूत इसकी मोटी-मोटी प्रधान शाखाएँ हैं और शब्दादि पाँच विषय रस हैं, ग्यारह इन्द्रियाँ शाखा हैं तथा जीव और ईश्वर—दो पक्षी इसमें घोंसला बनाकर निवास करते हैं। इस वृक्षमें वात, पित्त और कफरूप तीन तरहकी छाल है। इसमें दो तरहके फल लगते हैं—सुख और दुःख। यह विशाल वृक्ष सूर्यमण्डलतक फैला हुआ है (इस सूर्यमण्डलका भेदन कर जानेवाले मुक्त पुरुष फिर संसार-चक्रमें नहीं पड़ते)॥ २२॥