श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.12.17

एकादश स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

स एष जीवो विवरप्रसूतिः

प्राणेन घोषेण गुहां प्रविष्टः।

मनोमयं सूक्ष्ममुपेत्य रूपं

मात्रा स्वरो वर्ण इति स्थविष्ठः॥ १७

sa eṣa jīvo vivaraprasūtiḥ

prāṇena ghoṣeṇa guhāṃ praviṣṭaḥ|

manomayaṃ sūkṣmamupetya rūpaṃ

mātrā svaro varṇa iti sthaviṣṭhaḥ|| 17

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—प्रिय उद्धव! जिस परमात्माका परोक्षरूपसे वर्णन किया जाता है, वे साक्षात् अपरोक्ष—प्रत्यक्ष ही हैं, क्योंकि वे ही निखिल वस्तुओंको सत्ता-स्फूर्ति—जीवन-दान करनेवाले हैं, वे ही पहले अनाहत नादस्वरूप परा वाणी नामक प्राणके साथ मूलाधारचक्रमें प्रवेश करते हैं। उसके बाद मणिपूरकचक्र (नाभि-स्थान) में आकर पश्यन्ती वाणीका मनोमय सूक्ष्मरूप धारण करते हैं। तदनन्तर कण्ठदेशमें स्थित विशुद्ध नामक चक्रमें आते हैं और वहाँ मध्यमा वाणीके रूपमें व्यक्त होते हैं। फिर क्रमशः मुखमें आकर ह्रस्व-दीर्घादि मात्रा, उदात्त-अनुदात्त आदि स्वर तथा ककारादि वर्णरूप स्थूल—वैखरी वाणीका रूप ग्रहण कर लेते हैं॥ १७॥

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