श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.12.16

एकादश स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

उद्धव उवाच

संशयः शृण्वतो वाचं तव योगेश्‍वरेश्‍वर।

न निवर्तत आत्मस्थो येन भ्राम्यति मे मनः॥ १६

saṃśayaḥ śṛṇvato vācaṃ tava yogeśvareśvara|

na nivartata ātmastho yena bhrāmyati me manaḥ|| 16

अर्थ

उद्धवजीने कहा—सनकादि योगेश्‍वरोंके भी परमेश्‍वर प्रभो! यों तो मैं आपका उपदेश सुन रहा हूँ, परन्तु इससे मेरे मनका सन्देह मिट नहीं रहा है। मुझे स्वधर्मका पालन करना चाहिये या सब कुछ छोड़कर आपकी शरण ग्रहण करनी चाहिये, मेरा मन इसी दुविधामें लटक रहा है। आप कृपा करके मुझे भली-भाँति समझाइये॥ १६॥

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