श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.12.18

एकादश स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

यथानलः खेऽनिलबन्धुरूष्मा

बलेन दारुण्यधिमथ्यमानः।

अणुः प्रजातो हविषा समिध्यते

तथैव मे व्यक्तिरियं हि वाणी॥ १८

yathānalaḥ khe'nilabandhurūṣmā

balena dāruṇyadhimathyamānaḥ|

aṇuḥ prajāto haviṣā samidhyate

tathaiva me vyaktiriyaṃ hi vāṇī|| 18

अर्थ

अग्‍नि आकाशमें ऊष्मा अथवा विद्युत्के रूपसे अव्यक्तरूपमें स्थित है। जब बलपूर्वक काष्ठमन्थन किया जाता है, तब वायुकी सहायतासे वह पहले अत्यन्त सूक्ष्म चिनगारीके रूपमें प्रकट होती है और फिर आहुति देनेपर प्रचण्ड रूप धारण कर लेती है, वैसे ही मैं भी शब्दब्रह्मस्वरूपसे क्रमशः परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी वाणीके रूपमें प्रकट होता हूँ॥ १८॥

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