श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.12.24

एकादश स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

एवं गुरूपासनयैकभक्त्या

विद्याकुठारेण शितेन धीरः।

विवृश्‍च्य जीवाशयमप्रमत्तः

सम्पद्य चात्मानमथ त्यजास्त्रम्॥ २४

evaṃ gurūpāsanayaikabhaktyā

vidyākuṭhāreṇa śitena dhīraḥ|

vivṛścya jīvāśayamapramattaḥ

sampadya cātmānamatha tyajāstram|| 24

अर्थ

अतः उद्धव! तुम इस प्रकार गुरुदेवकी उपासनारूप अनन्य भक्तिके द्वारा अपने ज्ञानकी कुल्हाड़ीको तीखी कर लो और उसके द्वारा धैर्य एवं सावधानीसे जीवभावको काट डालो। फिर परमात्मस्वरूप होकर उस वृत्तिरूप अस्त्रोंको भी छोड़ दो और अपने अखण्ड स्वरूपमें ही स्थित हो रहो॥ २४॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे
द्वादशोऽध्यायः॥ १२॥

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