॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.13.1
अथ त्रयोदशोऽध्यायः
हंसरूपसे सनकादिको दिये हुए उपदेशका वर्णन
श्रीभगवानुवाच
सत्त्वं रजस्तम इति गुणा बुद्धेर्न चात्मनः।
सत्त्वेनान्यतमौ हन्यात् सत्त्वं सत्त्वेन चैव हि॥ १
sattvaṃ rajastama iti guṇā buddherna cātmanaḥ|
sattvenānyatamau hanyāt sattvaṃ sattvena caiva hi|| 1
अर्थ
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—प्रिय उद्धव! सत्त्व, रज और तम—ये तीनों बुद्धि (प्रकृति) के गुण हैं, आत्माके नहीं। सत्त्वके द्वारा रज और तम—इन दो गुणोंपर विजय प्राप्त कर लेनी चाहिये। तदनन्तर सत्त्वगुणकी शान्तवृत्तिके द्वारा उसकी दया आदि वृत्तियोंको भी शान्त कर देना चाहिये॥ १॥