श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.12.8

एकादश स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

केवलेन हि भावेन गोप्यो गावो नगा मृगाः।

येऽन्ये मूढधियो नागाः सिद्धा मामीयुरञ्जसा॥ ८

kevalena hi bhāvena gopyo gāvo nagā mṛgāḥ|

ye'nye mūḍhadhiyo nāgāḥ siddhā māmīyurañjasā|| 8

अर्थ

गोपियाँ, गायें, यमलार्जुन आदि वृक्ष, व्रजके हरिन आदि पशु, कालिय आदि नाग—ये तो साधन-साध्यके सम्बन्धमें सर्वथा ही मूढ़बुद्धि थे। इतने ही नहीं, ऐसे-ऐसे और भी बहुत हो गये हैं, जिन्होंने केवल प्रेमपूर्ण भावके द्वारा ही अनायास मेरी प्राप्ति कर ली और कृतकृत्य हो गये॥ ८॥

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