श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.13.6

एकादश स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

सात्त्विकान्येव सेवेत पुमान् सत्त्वविवृद्धये।

ततो धर्मस्ततो ज्ञानं यावत् स्मृतिरपोहनम्॥ ६

sāttvikānyeva seveta pumān sattvavivṛddhaye|

tato dharmastato jñānaṃ yāvat smṛtirapohanam|| 6

अर्थ

जबतक अपने आत्माका साक्षात्कार तथा स्थूल-सूक्ष्म शरीर और उनके कारण तीनों गुणोंकी निवृत्ति न हो, तबतक मनुष्यको चाहिये कि सत्त्वगुणकी वृद्धिके लिये सात्त्विक शास्त्र आदिका ही सेवन करे; क्योंकि उससे धर्मकी वृद्धि होती है और धर्मकी वृद्धिसे अन्तःकरण शुद्ध होकर आत्मतत्त्वका ज्ञान होता है॥ ६॥ बाँसोंकी रगड़से आग पैदा होती है और वह उनके सारे वनको जलाकर शान्त हो जाती है। वैसे ही यह शरीर गुणोंके वैषम्यसे उत्पन्‍न हुआ है। विचारद्वारा मन्थन करनेपर इससे ज्ञानाग्‍नि प्रज्वलित होती है और वह समस्त शरीरों एवं गुणोंको भस्म करके स्वयं भी शान्त हो जाती है॥ ७॥

यह व्याख्या श्लोक 11.13.6 से 11.13.7 तककी एक साथ है।

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