श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.13.7

एकादश स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

वेणुसंघर्षजो वह्निर्दग्ध्वा शाम्यति तद्वनम्।

एवं गुणव्यत्ययजो देहः शाम्यति तत्क्रियः॥ ७

veṇusaṃgharṣajo vahnirdagdhvā śāmyati tadvanam|

evaṃ guṇavyatyayajo dehaḥ śāmyati tatkriyaḥ|| 7

अर्थ

बाँसोंकी रगड़से आग पैदा होती है और वह उनके सारे वनको जलाकर शान्त हो जाती है। वैसे ही यह शरीर गुणोंके वैषम्यसे उत्पन्‍न हुआ है। विचारद्वारा मन्थन करनेपर इससे ज्ञानाग्‍नि प्रज्वलित होती है और वह समस्त शरीरों एवं गुणोंको भस्म करके स्वयं भी शान्त हो जाती है॥ ७॥

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