श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.14.15

एकादश स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

न तथा मे प्रियतम आत्मयोनिर्न शंकरः।

न च संकर्षणो न श्रीर्नैवात्मा च यथा भवान्॥ १५

na tathā me priyatama ātmayonirna śaṃkaraḥ|

na ca saṃkarṣaṇo na śrīrnaivātmā ca yathā bhavān|| 15

अर्थ

उद्धव! मुझे तुम्हारे-जैसे प्रेमी भक्त जितने प्रियतम हैं, उतने प्रिय मेरे पुत्र ब्रह्मा, आत्मा शंकर, सगे भाई बलरामजी, स्वयं अर्धांगिनी लक्ष्मीजी और मेरा अपना आत्मा भी नहीं है॥ १५॥

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