॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.14.16
निरपेक्षं मुनिं शान्तं निर्वैरं समदर्शनम्।
अनुव्रजाम्यहं नित्यं पूयेयेत्यङ्घ्रिरेणुभिः॥ १६
nirapekṣaṃ muniṃ śāntaṃ nirvairaṃ samadarśanam|
anuvrajāmyahaṃ nityaṃ pūyeyetyaṅghrireṇubhiḥ|| 16
अर्थ
जिसे किसीकी अपेक्षा नहीं, जो जगत्के चिन्तनसे सर्वथा उपरत होकर मेरे ही मनन-चिन्तनमें तल्लीन रहता है और राग-द्वेष न रखकर सबके प्रति समान दृष्टि रखता है, उस महात्माके पीछे-पीछे मैं निरन्तर यह सोचकर घूमा करता हूँ कि उसके चरणोंकी धूल उड़कर मेरे ऊपर पड़ जाय और मैं पवित्र हो जाऊँ॥ १६॥