श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.14.5

एकादश स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

तेभ्यः पितृभ्यस्तत्पुत्रा देवदानवगुह्यकाः।

मनुष्याः सिद्धगन्धर्वाः सविद्याधरचारणाः॥ ५

tebhyaḥ pitṛbhyastatputrā devadānavaguhyakāḥ|

manuṣyāḥ siddhagandharvāḥ savidyādharacāraṇāḥ|| 5

अर्थ

तदनन्तर इन ब्रह्मर्षियोंकी सन्तान देवता, दानव, गुह्यक, मनुष्य, सिद्ध, गन्धर्व, विद्याधर, चारण, किन्देव*, किन्‍नर†, नाग, राक्षस और किम्पुरुष‡ आदिने इसे अपने पूर्वज इन्हीं ब्रह्मर्षियोंसे प्राप्त किया। सभी जातियों और व्यक्तियोंके स्वभाव—उनकी वासनाएँ सत्त्व, रज और तमोगुणके कारण भिन्‍न-भिन्‍न हैं; इसलिये उनमें और उनकी बुद्धि-वृत्तियोंमें भी अनेकों भेद हैं। इसीलिये वे सभी अपनी-अपनी प्रकृतिके अनुसार उस वेदवाणीका भिन्‍न-भिन्‍न अर्थ ग्रहण करते हैं। वह वाणी ही ऐसी अलौकिक है कि उससे विभिन्‍न अर्थ निकलना स्वाभाविक ही है॥ ५—७॥

यह अर्थ श्लोक 5–7 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

टिप्पणियाँ

  1. *

    श्रम और स्वेदादि दुर्गन्धसे रहित होनेके कारण जिनके विषयमें ‘ये देवता हैं या मनुष्य’ ऐसा सन्देह हो, वे द्वीपान्तर-निवासी मनुष्य।

    (मुद्रित पृष्ठ 798)
  2. †

    मुख तथा शरीरकी आकृतिसे कुछ-कुछ मनुष्यके समान प्राणी।

    (मुद्रित पृष्ठ 798)
  3. ‡

    कुछ-कुछ पुरुषके समान प्रतीत होनेवाले वानरादि।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 798)

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