श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.15.10

एकादश स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

भूतसूक्ष्मात्मनि मयि तन्मात्रं धारयेन्मनः।

अणिमानमवाप्नोति तन्मात्रोपासको मम॥ १०

bhūtasūkṣmātmani mayi tanmātraṃ dhārayenmanaḥ|

aṇimānamavāpnoti tanmātropāsako mama|| 10

अर्थ

प्रिय उद्धव! पंचभूतोंकी सूक्ष्मतम मात्राएँ मेरा ही शरीर है। जो साधक केवल मेरे उसी शरीरकी उपासना करता है और अपने मनको तदाकार बनाकर उसीमें लगा देता है अर्थात् मेरे तन्मात्रात्मक शरीरके अतिरिक्त और किसी भी वस्तुका चिन्तन नहीं करता, उसे ‘अणिमा’ नामकी सिद्धि अर्थात् पत्थरकी चट्टान आदिमें भी प्रवेश करनेकी शक्ति—अणुता प्राप्त हो जाती है॥ १०॥

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