श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.15.13

एकादश स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

धारयन् मय्यहंतत्त्वे मनो वैकारिकेऽखिलम्।

सर्वेन्द्रियाणामात्मत्वं प्राप्तिं प्राप्नोति मन्मनाः॥ १३

dhārayan mayyahaṃtattve mano vaikārike'khilam|

sarvendriyāṇāmātmatvaṃ prāptiṃ prāpnoti manmanāḥ|| 13

अर्थ

जो सात्त्विक अहंकारको मेरा स्वरूप समझकर मेरे उसी रूपमें चित्तकी धारणा करता है, वह समस्त इन्द्रियोंका अधिष्ठाता हो जाता है। मेरा चिन्तन करनेवाला भक्त इस प्रकार ‘प्राप्ति’ नामकी सिद्धि प्राप्त कर लेता है॥ १३॥

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